Class- B. A l Sem


Subject - Hindi

Compiled by - Dr. Deepa vats




छायावाद हिंदी साहित्य की एक प्रमुख काव्य-धारा है (लगभग 1918-1936) जो रोमांटिक उत्थान का प्रतिनिधित्व करती है, जहाँ कवियों ने स्थूल जगत के बजाय सूक्ष्म, आत्मगत भावनाओं, प्रकृति-प्रेम और सौंदर्य का लाक्षणिक व प्रतीकात्मक शैली में वर्णन किया; इसमें व्यक्ति-चेतना, मानवीकरण और कल्पना की प्रधानता है, और यह खड़ी बोली को स्थापित करने वाला 'साहित्यिक खड़ी बोली का स्वर्णयुग' भी कहलाता है, जिसमें जयशंकर प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी वर्मा प्रमुख हैं।   
परिभाषा के मुख्य बिंदु:  

अर्थ: 'छाया' या 'प्रतिबिंब' से लिया गया, जो कवि की अंतरात्मा की अनुभूति और बाह्य जगत के बीच के संबंध को दर्शाता है।

भावनात्मकता: यह स्वानुभूति, रहस्यवाद और वेदना की अभिव्यक्ति पर जोर देता है, जहाँ कवि अपने आंतरिक भावों को व्यक्त करता है।

प्रकृति: प्रकृति को केवल बाह्य रूप में नहीं, बल्कि सजीव और भावनात्मक रूप में चित्रित किया गया (मानवीकरण)।

शैली: लाक्षणिक, प्रतीकात्मक और सूक्ष्म बिंबों का प्रयोग, और कोमल खड़ी बोली ।



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