Subject-Hindi
Compiled by- Dr. Deepa vats
भारतीय बौद्धिक इतिहास की दो सशक्त और परस्पर सम्बद्ध धाराएँ हैं। दोनों का मूल उद्देश्य सत्य, सौन्दर्य, अर्थ और जीवन-बोध की समग्र खोज है।
1. भारतीय ज्ञान परम्परा
भारतीय ज्ञान परम्परा समग्र (Holistic) और अनुभव-आधारित है। इसमें ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक, नैतिक और व्यावहारिक भी है।
प्रमुख विशेषताएँ
श्रुति–स्मृति परम्परा : वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक
अनुभूति की प्रधानता : अपरोक्षानुभूति को श्रेष्ठ ज्ञान माना गया
पुरुषार्थ चतुष्टय : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
लोक और परलोक का समन्वय
साधना और विवेक का महत्व
ज्ञान की प्रमुख धाराएँ
दार्शनिक परम्पराएँ : सांख्य, योग, वेदान्त, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा
आस्तिक–नास्तिक विमर्श : बौद्ध, जैन, चार्वाक
आध्यात्मिक लक्ष्य : आत्मा–ब्रह्म ऐक्य, निर्वाण, कैवल्य
2. भारतीय साहित्यशास्त्र की चिंतन परम्परा
भारतीय साहित्यशास्त्र, काव्य और कला के सौन्दर्यबोध का व्यवस्थित शास्त्र है। यह साहित्य को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोकमंगल और आत्मोन्नति का साधन मानता है।
प्रमुख सिद्धान्त
रस सिद्धान्त (भरतमुनि – नाट्यशास्त्र)
रस = स्थायी भाव + विभाव + अनुभाव + संचारी भाव
शृंगार, करुण, वीर, रौद्र, हास्य, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, शान्त
ध्वनि सिद्धान्त (आनन्दवर्धन)
काव्य की आत्मा = ध्वनि
व्यंजना की प्रधानता
अलंकार सिद्धान्त
भाषा और शैली का सौन्दर्य
उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि
रीति सिद्धान्त
वैदर्भी, गौड़ी, पांचाली रीति
वक्रोक्ति सिद्धान्त (कुन्तक)
कथन की विशिष्ट वक्रता
औचित्य सिद्धान्त (क्षेमेन्द्र)
भाव, पात्र, देश–काल की संगति
3. ज्ञान परम्परा और साहित्यशास्त्र का अन्तर्सम्बन्ध
भारतीय ज्ञान परम्परा
भारतीय साहित्यशास्त्र
आत्मानुभूति
रसास्वादन
ब्रह्म–सत्य
सौन्दर्य–सत्य
मोक्ष
शान्त रस
योग–साधना
काव्य–साधना
लोककल्याण
सहृदय की भावोन्नति
👉 साहित्यशास्त्र, ज्ञान परम्परा का सौन्दर्यात्मक विस्तार है।
4. निष्कर्ष
भारतीय ज्ञान परम्परा और भारतीय साहित्यशास्त्र की चिंतन परम्परा जीवन को पूर्णता में देखने की दृष्टि प्रदान करती हैं। जहाँ ज्ञान परम्परा जीवन का तत्त्वबोध कराती है, वहीं साहित्यशास्त्र उसे रस, भाव और सौन्दर्य के माध्यम से अनुभूत कराता है।
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